ज्ञान महत्वम् कविता

 कवि : विनोद यादव

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{ प्रथम चार गुरू कौन होते हैं }

 प्रथमा गुरु मातु पिता, द्वितीया गुरु जाप।

तृतीय गुरु काल है, चौथा गुरु आप॥


{ ज्ञान हमें प्रकाशित करता है } 

ज्ञान ऐसा होवे है, नाहिं अंधेरे भोर। 

ज्ञानी होवे ज्ञान से, प्रकाशित चहूंँ ओर॥


{ वेद सार गायत्री मंत्र के रूप में } 

फूले का सार मधुरस, दूध सार घीयास। 
वेद सार गायत्री मंत्र, कहते महर्षि व्यास॥

{ विद्यार्थी के 5 गुणों के रूप में } 

ध्यान बगु स्वाने शनये, भोजने अल्पहारि।
काक चेष्टा गुरु नमे, सदैव पाठनकारि॥

{ बिना अनुभव के ज्ञान ना बांटे }  

जीवन में नहिं अनुभूति, कहे न सिद्ध विचार।
समय होत ऊलट फेर, परे परीक्षा पछार॥

{ स्वार्थपूर्ण कर्मो (अकर्म) से बचें } 

मानुष तन अनमोल रे, करो न भोग विलाज।
उसकी दी इसी तनका, करो सत्कर्म आज॥

{ हरि गुण आचरण में लाना भक्ति है} 

भजत भजत पत्थर भजे, भजे पत्थर गुन नाहिं। 
सुमिरे जो गोविंद गुने, पागल पिंयांरि ओहिं॥



 

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और भी बहुत कुछ है आगे 

अपडेट करता रहूंगा🚩

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